Thursday, November 22, 2007

हिमाचल भाग १

कुछ खास पलों के लिए आप कभी कभी प्रयास करते हैं कुछ खास करने का | इसलिए यह मेरा प्रयत्न है मेरी मनाली यात्रा को हिन्दी में बयान करने का | एक ऐसी यात्रा जो कुछ खास लोगों की वजह से और भी अनमोल हो गयी | वह जानते हैं कि वो कौन हैं |

अमीर खुसरो ने कश्मीर में क्या देख कर उसे धरती का स्वर्ग कहा, यह पूर्णतया तो मुझे नहीं पता, परन्तु पहाड़ों का उस मत में अवश्य ही योगदान रहा होगा | और आप मेरे पहाड़ों के प्रेम की तुलना शमा के लिए परवाने के प्रेम से भी करें तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी | खैर यह ना तो मेरी प्रेम कहानी का वर्णन है और ना ही किसी बौलीवुड मूवी की पटकथा | यह वृत्तांत है दोस्तों के साथ मेरी हिमाचल की एक हसीन यात्रा का | एक ऐसी यात्रा जिसमें वहाँ के अद्भुत सौंदर्य ने हमें ना सिर्फ मंत्रमुग्ध किया बल्कि निशब्द भी कर दिया |

हमारी यात्रा शुरू हुई दिल्ली में हिमाचल भवन से, जहाँ हिमाचल पथ परिवहन की बस प्रारंभ होती है | हालांकि हमें बताया गया था कि यह यात्रा १४ घंटे की है परन्तु वह १६ घंटे के साबित हुई | मगर कुल मिला कर यात्रा आरामदायक ही थी (अगर आप २.५ घंटे की उस पीड़ा को भुला दें जो एक "ढोल" नामक चलचित्र ने हमें पहुँचाई)| बीच में दो छोटे पड़ाव थे | पहला चंडीगढ़ के पास, जहाँ बस से बाहर कदम रखते ही हमें उस मीठी ठंड का एहसास हुआ जिसके लिए आप मुम्बई में तरस जायेंगे | एक हल्की बयार आपको भीतर तक स्पर्श करती हुई मानो आपको दुलार रही हो, एक सखी की तरह | दूसरा पड़ाव था सुबह सुबह पहाड़ों के नजदीक कुल्लू से थोड़ा पहले, जहाँ ढाबे की गरम चाय और स्वच्छ, साफ, ठंडी हवा का मिश्रण आपको सम्पूर्ण ताजगी का अनुभव देता है | एक तरफ यह अनुभव जहाँ आपको प्रसन्न कर देगा, वहीं आप आतुर भी हो जायेंगे, जल्द से जल्द अपनी मंज़िल तक पहुँचने को | जहाँ आपको आशा है, और भी आनंद की | हमारे लिए यह मंज़िल थी हिमाचल पर्यटन के "लॉग हट्स" | पुराने अनुभवों के आधार पर हमें आशा थी कि राज्य पर्यटन विभाग के होटल इत्यादी अच्छी जगह पर ही बने होंगे | और हमारी आशानुसार ही यह लॉग हट्स बेहद खूबसूरत जगह पर स्थित हैं | जहाँ आप जिस तरफ भी नज़र घुमायेँगे आपको सुन्दरता के विभिन्न आयामों का प्रदर्शन दिखाई देगा | वो चाहे पहाड़ों की चोटी पर सफ़ेद बर्फ की चादर हो या चिनार के लंबे पेड़ | खिले फूलों का नाच या लौग हट की दीवारों पर लिपटी बेलें, जिन पर पीली पत्तियां कोलाज के तरह चिपकी हों |

पहले दिन हमने आराम से प्राकृतिक सौंदर्य को मद्धम मद्धम समाहित करने का निश्चय किया | और एक जगह भर-पेट भोजन कर पहले-पहल पास ही में स्थित हिडिम्बा देवी के मंदिर की ओर चल दिए | बेहद खूबसूरत पेड़ों के झुरमुट में बने इस मंदिर में दर्शन के बाद आस पास के शांत वातावरण में कुछ चहलकदमी करते रहे | कभी हवा में लहराती कुछ आवाज़ों के बीच झूलों पर बच्चे बन कर, तो कभी भिन्न भिन्न दर्शनीय जगहों पर तस्वीरें खिंचवा कर | तदोपरान्त थोड़ा नीचे नदी किनारे जा कर हमने आराम किया और फिर शाम की तैयारी के लिए दो गुटों में बंट गए | शाम को स्टाफ की मदद से आग लगा कर उसके चारों और बैठ मदिरा की गर्माहट को भी महसूस किया | हल्की हल्की मदहोशी में मदमस्त हो कर मुम्बई के दौड़ भाग से दूर आप एक खुमारी में खो जाने के बाद एक अलग ही आनंद की अनुभूति करते हैं | इस तरह हमने रात का अंत किया |

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